चाँद फीका सा था...
कल रात चाँद को देखा तो नजाने क्यूँ फीका सा लगा,,
छुआ जो खंजर को किस्मत बदलने के लिए तो वो भी कुछ कम तीखा सा लगा.....

यादों में डुब्बी सुबह को आँखों से निकला जो पानी,,
वो भी कुछ कम गिला सा लगा..

बादल नज़र न आए आसमान में,,,
पर फिर भी वो नीला नीला सा लगा......

वो तोहफे,,वो खत,, वो सब यद्दें जलाई तो थी उस आग में ,,,
पर फिर भी उसमे वो गर्मी न थी....

रोया रात भर तकिये को पकद्द कर ज़ोर से,,,
पर उसके हाथों सी नरमी न थी....

अब लगता है की वो ही ज़रूरत है जिंदगी की,,
चाहे लाख दुआएं मांग लू खुदा के दर्र पर,,,
गर ज़रूरत तो उस्की बंदगी की है......

~~~~~तनुज कुमार डोगरा~~~

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